Italian 5G Network Sharing 2026: TIM, Fastweb और Vodafone का नया मॉडल

साथियों नमस्कार, स्वागत है आपका Tech Mobile Sathi पोर्टल पर। आज हम एक ऐसे विषय पर बात करेंगे जो तकनीकी दुनिया में तो बहुत ज़रूरी है, लेकिन अक्सर हमारी नज़रों से बच जाता है—और वो है 5G Network Sharing। साल 2026 में इटली के टेलीकॉम मार्केट में जो कुछ हो रहा है, वो भारत जैसे देशों के लिए एक बड़ा सबक हो सकता है। वहां के बड़े खिलाडी जैसे TIM (Telecom Italia) और Fastweb (जिसमें अब Vodafone Italia भी शामिल है) मिलकर एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर रहे हैं जो न सिर्फ तेज़ है, बल्कि ऑपरेटर्स की जेब पर पड़ने वाले बोझ को भी कम कर रहा है। चलिए, गहराई से समझते हैं इटली के इस "नेटवर्क रिवोल्यूशन" को!

Italian 5G Network Sharing 2026: TIM, Fastweb और Vodafone का नया मॉडल

Fastweb और Vodafone का महा-विलय: इटली के मार्केट में नया 'पावरहाउस'

दोस्तों, 2026 की शुरुआत इटली के लिए एक बहुत बड़े बदलाव के साथ हुई है। 1 जनवरी 2026 से Fastweb और Vodafone Italia अब आधिकारिक रूप से एक ही कंपनी बन चुके हैं। एग्रीमेंट तो पहले ही हो चुका था, लेकिन इस साल इस मर्जर (Merger) ने इटली के टेलीकॉम मैप को पूरी तरह बदल दिया है। अब यह नई इकाई (Entity) इटली की सबसे बड़ी मोबाइल ऑपरेटर बन गई है, जिसके पास 20 मिलियन से ज्यादा मोबाइल लाइन्स हैं। यह सिर्फ दो दफ्तरों का मिलना नहीं है, बल्कि यह संसाधनों का एक ऐसा संगम है जो आने वाले दशक की दिशा तय करेगा। जब हम इस मर्जर की गहराई में जाते हैं, तो समझ आता है कि स्विसकॉम (Swisscom), जो Fastweb की पैरेंट कंपनी है, उसने करीब 8 बिलियन यूरो खर्च करके वोडाफोन इटली को खरीदा है। यह निवेश केवल ग्राहक संख्या बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि इटली के डिजिटल भविष्य पर कब्ज़ा करने के लिए किया गया है।

एक टेक एनालिस्ट के तौर पर मेरा मानना है कि यह मर्जर सिर्फ दो कंपनियों का जुड़ना नहीं है, बल्कि यह 5G Rollout को तेज़ करने की एक सोची-समझी रणनीति है। जब दो कंपनियां अपनी ताकत मिलाती हैं, तो उनके पास स्पेक्ट्रम और इंफ्रास्ट्रक्चर का एक बड़ा भंडार जमा हो जाता है। अब Fastweb+Vodafone के पास 20,000 से ज्यादा रेडियो साइट्स हैं, जो इटली की 87% आबादी को कवर करती हैं। यह मर्जर इटली के पुराने ऑपरेटर TIM के लिए एक बड़ी चुनौती है, लेकिन साथ ही इसने दोनों के बीच सहयोग के नए रास्ते भी खोल दिए हैं। इस मर्जर के बाद, इटली में अब मुख्य रूप से तीन बड़े खिलाडी बचे हैं—नई वोडाफोन-फास्टवेब इकाई, टिम (TIM) और विंड ट्रे (Wind Tre)। जब खिलाडी कम होते हैं और ताकतवर होते हैं, तो वे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में निवेश करने की क्षमता रखते हैं।

इस मर्जर का सबसे बड़ा फायदा ग्राहकों को मिल रहा है। जब इंफ्रास्ट्रक्चर शेयर होता है, तो कंपनियों का OPEX (Operating Expenditure) कम हो जाता है, जिससे वे ग्राहकों को बेहतर प्लान्स और स्थिर नेटवर्क दे पाती हैं। Tech Mobile Sathi के पाठकों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि जब मार्केट में कॉम्पीटिशन बढ़ता है और कंपनियां रिसोर्सेज शेयर करती हैं, तो अंत में फायदा यूजर का ही होता है। इटली का यह मॉडल दिखा रहा है कि कैसे बड़ी कंपनियां आपस में लड़ने के बजाय 'को-ऑपरेशन' (Co-operation) के ज़रिए अपना प्रॉफिट और सर्विस क्वालिटी दोनों सुधार सकती हैं। 2026 के इस दौर में, जहाँ 5G डेटा की खपत आसमान छू रही है, अकेले दम पर नेटवर्क बिछाना किसी भी कंपनी के लिए वित्तीय रूप से आत्महत्या जैसा है। इसलिए, यह मर्जर एक मजबूरी भी थी और एक मास्टरस्ट्रोक भी। अब इटली के लोग बिना किसी कॉल ड्रॉप के उन इलाकों में भी 5G का इस्तेमाल कर पा रहे हैं जहाँ पहले 4G के सिग्नल भी मुश्किल से मिलते थे।

Project Prism: TIM और Fastweb का 300 मिलियन यूरो बचाने वाला मास्टरप्लान

अब बात करते हैं साल 2026 के सबसे चर्चित समझौते की, जिसे इंटरनली 'Project Prism' कहा जा रहा है। Telecom Italia (TIM) और Fastweb ने एक रणनीतिक साझेदारी की है जिसे RAN Sharing (Radio Access Network Sharing) मॉडल कहा जाता है। इस डील के तहत, दोनों कंपनियां अपने 5G एक्टिव कंपोनेंट्स जैसे कि एंटेना, बेस स्टेशन्स और रेडियो यूनिट्स को एक-दूसरे के साथ साझा करेंगी। अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि "कमल भाई, ये कंपनियां अपनी मशीनें दूसरों को क्यों इस्तेमाल करने दे रही हैं?" इसका जवाब सीधा है—बचत और रफ़्तार। अगर टिम (TIM) एक टावर लगाता है और फास्टवेब दूसरा, तो खर्चा दोगुना होता है। लेकिन अगर एक ही टावर पर दोनों की मशीनें लग जाएं, तो लागत आधी रह जाती है।

दोस्तों, यह कोई छोटा-मोटा समझौता नहीं है। इस डील के ज़रिए दोनों ऑपरेटर्स को अगले 10 सालों में 250 से 300 मिलियन यूरो (करीब 2700 करोड़ रुपये) की बचत होने वाली है। जरा सोचिए, इतनी बड़ी रकम को कंपनियां अपनी टेक्नोलॉजी और 5G Standalone (SA) नेटवर्क को बेहतर बनाने में लगा सकती हैं। Q2 2026 तक इस डील का फाइनल कॉन्ट्रैक्ट होने की उम्मीद है, और इसके तहत करीब 15,500 साइट्स को शेयर किया जाएगा। इसका मतलब है कि इटली का लगभग आधा हिस्सा अब एक 'साझा डिजिटल हाईवे' पर चल रहा है। यह बचत केवल बैलेंस शीट पर नहीं दिखती, बल्कि यह नई रिसर्च और 6G की तैयारी में भी निवेश की जा रही है। टिम जैसी कंपनी, जो कर्ज के बोझ से दबी हुई थी, उसके लिए 'प्रोजेक्ट प्रिज्म' एक लाइफलाइन साबित हो रहा है।

मुझे प्रोजेक्ट प्रिज्म इसलिए पसंद है क्योंकि यह 'डुप्लीकेशन' को रोकता है। अक्सर हम देखते हैं कि एक ही गली में चार अलग-अलग कंपनियों के टावर लगे होते हैं, जो न तो एनवायरनमेंट के लिए अच्छे हैं और न ही कंपनियों की इकोनॉमी के लिए। इटली ने इस समस्या को जड़ से खत्म करने का फैसला किया है। प्रोजेक्ट प्रिज्म के तहत, हर ऑपरेटर इटली के 10-10 क्षेत्रों (Regions) में नेटवर्क अपग्रेड की जिम्मेदारी उठाएगा। यानी एक क्षेत्र में अगर TIM काम कर रहा है, तो Fastweb उसके नेटवर्क का उपयोग करेगा, और दूसरे क्षेत्र में इसका उल्टा होगा। यह 'स्मार्ट शेयरिंग' ही 2026 की असली टेक क्रांति है। यह मॉडल न केवल कंपनियों का पैसा बचाता है, बल्कि कार्बन फुटप्रिंट को भी कम करता है। कम बिजली की खपत और कम इलेक्ट्रॉनिक कचरा—यही वो सस्टेनेबल अप्रोच है जिसकी आज पूरी दुनिया को ज़रूरत है। इटली का यह प्रयोग अब पूरे यूरोप के लिए एक केस स्टडी बन चुका है और मेरा मानना है कि अगले कुछ सालों में भारत में भी हमें ऐसे ही 'प्रिज्म' जैसे प्रोजेक्ट्स देखने को मिलेंगे।

ग्रामीण इटली का उदय: छोटे शहरों पर 5G का विशेष फोकस

अक्सर देखा गया है कि नई टेक्नोलॉजी पहले बड़े शहरों में आती है और गांव-देहात पीछे छूट जाते हैं। लेकिन इटली के ऑपरेटर्स ने 2026 में इस ट्रेंड को बदल दिया है। TIM और Fastweb के एग्रीमेंट का मुख्य फोकस उन छोटे शहरों और कस्बों पर है जहाँ की आबादी 35,000 से कम है। इटली जैसे देश में, जहाँ पहाड़ी इलाके और दूर-दराज़ के गांव बहुत हैं, वहां अलग-अलग 5G नेटवर्क बिछाना कंपनियों के लिए घाटे का सौदा होता था। कल्पना कीजिये कि एक छोटा सा गांव है जो आल्प्स की पहाड़ियों के बीच बसा है। वहां तक फाइबर बिछाना या नया टावर खड़ा करना करोड़ों का काम है। अगर वहां दो कंपनियां अलग-अलग निवेश करें, तो उन्हें अपना पैसा वसूलने में दशकों लग जाएंगे। लेकिन 'नेटवर्क शेयरिंग' ने इसे मुमकिन बना दिया है।

यहाँ 'नेटवर्क शेयरिंग' एक वरदान साबित हो रही है। इस साझेदारी की मदद से इटली की 60% आबादी, जो इन छोटे क्षेत्रों में रहती है, अब 1 Gbps तक की स्पीड का आनंद ले पाएगी। कंपनियों का लक्ष्य 2028 तक इस साझा नेटवर्क को पूरी तरह तैयार कर लेना है। मेरा मानना है कि यह Digital Inclusion का सबसे बेहतरीन उदाहरण है। जब सरकार और कंपनियां मिलकर काम करती हैं, तो डिजिटल डिवाइड (Digital Divide) कम होता है। इटली की सरकार ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने नियम आसान किये और कंपनियों को प्रोत्साहित किया कि वे साथ मिलकर काम करें। 2026 में इटली के ये ग्रामीण इलाके अब 'डिजिटल विलेज' बन चुके हैं जहाँ टेलीमेडिसिन और ऑनलाइन एजुकेशन अब हकीकत है।

इटली के नियामक (Regulators) जैसे AGCOM और AGCM भी इस डील पर पैनी नज़र रखे हुए हैं ताकि मार्केट में कॉम्पीटिशन बना रहे। लेकिन वे भी जानते हैं कि 'अंडर-सर्व्ड' (Underserved) इलाकों में इंटरनेट पहुँचाने का यही इकलौता और सबसे किफायती तरीका है। Tech Mobile Sathi पर हम हमेशा कहते हैं कि गांव का विकास ही देश का विकास है, और इटली की यह 5G शेयरिंग स्ट्रेटेजी बिलकुल इसी रास्ते पर चल रही है। वहां के किसान अब स्मार्ट एग्रीकल्चर के लिए आईओटी (IoT) सेंसर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो सीधे 5G नेटवर्क से जुड़े हैं। यह सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि कंपनियों ने 'मेरा टावर' और 'तेरा टावर' की लड़ाई छोड़कर 'हमारा नेटवर्क' बनाने पर ध्यान दिया। आज इटली का एक छोटा सा अंगूर का बागान भी उसी रफ़्तार से इंटरनेट इस्तेमाल कर रहा है जो रोम या मिलान जैसे शहरों में उपलब्ध है। यह बदलाव वाकई दिल को छू लेने वाला है और यह दिखाता है कि तकनीक का असली मकसद इंसानी दूरियों को कम करना ही है।

INWIT और टावर इकोनॉमिक्स: 2026 का वित्तीय गेमचेंजर

जब हम नेटवर्क की बात करते हैं, तो हमें उन टावरों को नहीं भूलना चाहिए जिन पर ये एंटेना लगे होते हैं। इटली में INWIT सबसे बड़ी टावर कंपनी (TowerCo) है और 2026 में इसकी भूमिका किसी हीरो से कम नहीं है। TIM और Vodafone ने अपनी पैसिव इंफ्रास्ट्रक्चर (टावर्स) को पहले ही INWIT में मर्ज कर दिया था। 2026 तक, इस विलय से होने वाली बचत या 'Synergies' अपनी पूरी क्षमता पर पहुँच चुकी हैं। टावर कंपनियां अब केवल लोहे के खम्बे खड़ी करने वाली कंपनियां नहीं रहीं, बल्कि वे डेटा और ऊर्जा की असली केंद्र बन गई हैं। INWIT के पास इटली में 24,000 से ज्यादा टावर हैं, और 2026 के आंकड़ों के अनुसार, हर टावर पर औसतन 2.2 'टेनेंट' (Tenant) यानी ऑपरेटर्स मौजूद हैं।

INWIT के लिए 2026 एक 'बम्पर' साल साबित हो रहा है। कंपनी का रेवेन्यू 1 बिलियन यूरो को पार करने का अनुमान है। यहाँ 'शेयरिंग' का असली जादू आंकड़ों में दिखता है। करीब 13,000 नई 5G साइट्स को INWIT के टावरों पर होस्ट किया जा रहा है। इसका मतलब है कि एक ही टावर पर अब पहले से कहीं ज्यादा ऑपरेटर्स के एंटेना लगे हैं, जिसे 'Tenancy Ratio' बढ़ना कहते हैं। इससे टावर कंपनी को ज्यादा पैसा मिलता है और ऑपरेटर्स को कम किराये में टावर मिल जाता है। यह एक 'विन-विन' (Win-Win) सिचुएशन है। आप सोच रहे होंगे कि इसमें हमारा क्या फायदा? दोस्तों, जब कंपनियों का किराया बचता है, तो वे अपने डेटा पैक्स को सस्ता रख पाती हैं। इटली में आज 5G डेटा की कीमतें दुनिया में सबसे कम स्तरों पर हैं, और इसका बड़ा श्रेय INWIT जैसे टावर मॉडल्स को जाता है।

इतना ही नहीं, INWIT अब सिर्फ टावर कंपनी नहीं रही। 2026 में यह Smart Infrastructure कंपनी बन गई है। वे अब सड़कों और हाईवे की सुरंगों (Tunnels) में DAS (Distributed Antenna System) लगा रहे हैं ताकि चलती गाड़ियों में भी 5G सिग्नल न टूटे। वे अपने टावरों पर सोलर पैनल भी लगा रहे हैं ताकि बिजली की बचत हो सके। इटली का यह मॉडल दिखाता है कि अगर इंफ्रास्ट्रक्चर को सर्विस से अलग कर दिया जाए (Asset Light Model), तो टेलिकॉम कंपनियां अपना सारा ध्यान और पैसा नई खोजों और बेहतर कस्टमर सर्विस पर लगा सकती हैं। INWIT अब 'स्मार्ट सिटी' प्रोजेक्ट्स में भी हाथ आज़मा रहा है, जहाँ उनके टावर्स पर एयर क्वालिटी सेंसर्स और स्मार्ट स्ट्रीट लाइट्स लगाई जा रही हैं। यह टावर इकोनॉमिक्स का वो नया चेहरा है जो आने वाले समय में पूरी दुनिया अपनाएगी। कमल कृपाल के तौर पर मेरा मानना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर का साझा होना ही वो चाबी है जो भविष्य के 'गीगाबिट समाज' का ताला खोलेगी।

5G Standalone (SA) और 6G की तैयारी: भविष्य की नींव

2026 में इटली के ऑपरेटर्स सिर्फ कवरेज नहीं बढ़ा रहे, बल्कि नेटवर्क की 'क्वालिटी' पर भी काम कर रहे हैं। अब ध्यान 5G Non-Standalone (जो 4G की मदद से चलता था) से हटकर 5G Standalone (5G SA) पर चला गया है। 5G SA का मतलब है पूरी तरह से नया कोर नेटवर्क, जो क्लाउड-नेटिव (Cloud-native) है। यही वो टेक्नोलॉजी है जो सही मायने में अल्ट्रा-लो लेटेंसी और नेटवर्क स्लाइसिंग (Network Slicing) जैसी सुविधाएं देती है। मान लीजिये कि एक एम्बुलेंस सड़क पर जा रही है, तो नेटवर्क उसे एक 'स्पेशल लेन' (Slicing) दे सकता है ताकि उसका डेटा कभी न रुके। इटली में अब ऐसी ही तकनीकों का परीक्षण सफल हो चुका है।

नेटवर्क शेयरिंग के कारण जो पैसे बच रहे हैं, TIM और Fastweb उन्हें इसी 5G SA इंफ्रास्ट्रक्चर में लगा रहे हैं। इससे इटली अब यूरोप के उन देशों की लिस्ट में शामिल हो गया है जहाँ 5G का इस्तेमाल सिर्फ मोबाइल चलाने के लिए नहीं, बल्कि Smart Factories, ऑटोनॉमस गाड़ियों और रिमोट सर्जरी जैसे हाई-टेक कामों के लिए हो रहा है। इसके अलावा, 2026 में ही 5G-Advanced (जिसे 5.5G भी कहते हैं) की टेस्टिंग शुरू हो गई है, जो 6G के आने से पहले का एक पड़ाव है। इटली की यूनिवर्सिटीज़ और ऑपरेटर्स मिलकर 6G रिसर्च सेंटर पर काम कर रहे हैं, और उनके पास इसके लिए पर्याप्त फंड है, क्योंकि उन्होंने फालतू के टावर खड़े करने में पैसे बर्बाद नहीं किये।

इटली के ऑपरेटर्स को अब सुरक्षा (Cybersecurity) पर भी काफी खर्च करना पड़ रहा है। यूरोपीय संघ (EU) के नए 'Cybersecurity Package 2026' के अनुसार, कंपनियों को पुराने और जोखिम भरे वेंडर्स के इक्विपमेंट बदलने पड़ रहे हैं। शेयरिंग मॉडल यहाँ भी मदद करता है—जब दो कंपनियां मिलकर नया सुरक्षित नेटवर्क बिछाती हैं, तो रिप्लेसमेंट की लागत आधी हो जाती है। यह पूरी स्ट्रेटेजी दिखाती है कि इटली अब दुनिया की डिजिटल रेस में पिछड़ना नहीं चाहता। वे अपनी कमियों को पहचान रहे हैं और 'शेयरिंग' को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना रहे हैं। भविष्य में जब हम 2026 को पीछे मुड़कर देखेंगे, तो हमें समझ आएगा कि इटली ने उस समय जो फैसले लिए थे, उन्हीं की वजह से आज वो यूरोप का सबसे डिजिटल रूप से संपन्न देश है। कमल कृपाल की नज़र में, यह 'इटालियन जॉब' वाकई काबिले तारीफ है।

Conclusion

दोस्तों, इटली का यह 'Prism Project' और Fastweb-Vodafone का मर्जर हमें यह सिखाता है कि टेक्नोलॉजी को घर-घर पहुँचाने के लिए कभी-कभी हाथ मिलाना ज़रूरी होता है। भारत में भी हमें कुछ ऐसा ही देखने को मिल सकता है जहाँ ऑपरेटर्स आपस में टावर और स्पेक्ट्रम शेयर करके इंटरनेट को और सस्ता और सुलभ बनाएंगे। 2026 का साल इटली के लिए 'कनेक्टिविटी' का स्वर्ण युग है। अगर हम इस मॉडल से कुछ सीख सकें, तो यकीन मानिए हमारे देश के सुदूर गांवों में भी 5G की लहर उतनी ही तेज़ होगी जितनी दिल्ली या बेंगलुरु में। आपको क्या लगता है? क्या भारत में भी जिओ और एयरटेल को ग्रामीण इलाकों के लिए ऐसा कोई समझौता करना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट्स में ज़रूर लिखें। जुड़े रहिये Tech Mobile Sathi के साथ!

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